राहुल और प्रियंका गांधी ने हाथरस जाने का जिस तरह किया दिखावा, वह सस्ती राजनीति के अलावा और कुछ नहीं

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हाथरस में हिंसा की शिकार एक दलित युवती की दिल्ली में उपचार के दौरान मौत के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया है। हालांकि, सामूहिक दुष्कर्म के आरोप की पुष्टि नहीं हुई फिर भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। सभ्य समाज और कानून के शासन को शर्मसार करने वाले ऐसे मामले को चर्चा का विषय बनना ही चाहिए, क्योंकि वह इस कटु सत्य को भी बयान करता है कि दलित समाज अब भी प्रताड़ित हो रहा है।

यह स्वाभाविक है कि हाथरस कांड को लेकर स्थानीय पुलिस-प्रशासन के साथ उत्तर प्रदेश सरकार भी आलोचना के निशाने पर है, लेकिन क्या यह आवश्यक नहीं कि उस मानसिकता पर भी करारा प्रहार हो, जिसके चलते दलितों पर अत्याचार का सिलसिला कायम है?

यदि यह समझा जा रहा है कि दलित विरोधी मानसिकता का निदान केवल पुलिस-प्रशासन की सक्रियता अथवा कठोर कानूनों के बल पर हो जाएगा तो यह सही नहीं। यह बात दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं पर भी लागू होती है। यह गंभीर चिंता का विषय है कि दुष्कर्म के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। मासूम बच्चियां तक दरिंदगी का शिकार बन रही हैं।

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