ऋषि पंचमी के महापर्व पर श्रीमाली ब्राह्मण समाज की महिलाएं पदम सागर तालाब में किया दिवंगत पूर्वजों को तर्पण

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फ़ोटो जितेन्द्र पुरोहित

जोधपुर । भाद्रपद शुक्ला पंचमी को ऋषि पंचमी के दिन जोधपुर में श्रीमाली ब्राह्मण समाज की महिलाओं की ओर से सप्त ऋषियों एवं पूर्वजों के प्रति आस्था व्यक्त करने के लिए तर्पण करने की अनूठी परम्परा सदियों से चली आ रही है।
व्रती महिलाएं सप्त ऋषियों एवं ऋषि पत्नियों के नाम सगोत्र शास्त्रोक्त विधि से तर्पण कर मोक्ष की कामना करती है। इतना ही नहीं पवित्र जलाशयों पर ससुराल व पीहर पक्ष की तीन-तीन पीढिय़ों तक के दिवंगत ज्ञात अज्ञात पूर्वजों को याद कर तर्पण करती है। साथ ही अपने एक दिन के व्रत का पुण्य फल भी पूर्वजों को मोक्ष और सद्गति के लिए समर्पित करती है। तर्पण के बाद नीम, आक, पीपल, बोल्टी एवं हाटी-काटी वृक्ष का पूजन कर समाज की बुजुर्ग महिलाओं से ऋषि पंचमी से जुड़ी पौराणिक कथाओं का श्रवण करती है। कथा श्रवण के बाद व्रती महिलाएं अपने घरों में मणीचा (बिना बोया धान) की खीर, बनाकर ऋ षियों, ऋ षि पत्नियों व अपने और पीहर के सात पीढिय़ों के पूर्वजों को तुरई-काचरे की सब्जी, केर-सांगरी का रायता पितरों को अर्पित कर व्रत का पारणा करती है।

मणीचे के आटा का हलवा, राब-खीर लगता है भोग

पं रमेशचंद्र बोहरा के अनुसार इस व्रत को करने वाली व्रती महिलाएं वनक्षेत्र में पैदा होने वाले मणीचे के आटा का भोग ठाकुरजी, सप्त ऋषियों व ऋषि पत्नियों को लगाकर प्रसाद ग्रहण करते थे। मणीचे का आटा फलाहार की श्रेणी में आता है, उस मणीचे को शुद्ध व साफ कर काम में लेते थे। उस मणीचे के आटे का हलवा, खीर व राब बनाकर तथा साथ में तुरई की सब्जी का सेवन किए जाने की परम्परा है

This News is Updated by Khabre Fatafat
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