प्रदेश में नमक का सबसे अधिक उत्पादन नावां में होता है। यहां अंग्रेजों ने नमक का उत्पादन करने के लिए झील के किनारे रेलवे लाइन बिछाई और फिर सांभर साल्ट कंपनी द्वारा नमक उत्पादन शुरू किया। यहां बनाए जाना वाला नमक प्राकृतिक तरीके से तैयार किया जाता है। सबसे पहले उद्यमी जमीन पर क्यार और कंटासर बनाए जाते हैं फिर बोरवेल का पानी कंटासर में डाला जाता है। इसके बाद पानी को एक से दूसरे और फिर तीसरे कंटासर से घुमाया जाता है।
इस प्रक्रिया से पानी को करीब 25 डिग्री तक खारा किया जाता है। पानी को क्यारियों में डाला जाता है। तेज धूप के कारण पानी धीरे-धीरे नमक के रूप में बदल जाता है। इसके बाद इसे नमक प्लांट और रिफाइनरी तक पंहुचाया जाता है।
नमक बनाने वाले मजदूरों का दर्द
जिस नमक को हम स्वाद के लिए खाते हैं उसे बनाने वाले मजदूरों का सच हैरान करने वाला है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जो मजदूर नमक बनाने का काम करते हैं। उनकी मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार करना बहुत मुश्किल होता है। कई सालों तक नमक में काम करने के कारण उनके शरीर कुछ हिस्से जलते तक नहीं हैं। अंतिम संस्कार के समय उनके हाथ और पैर का जलना बहुत मुश्किल हो जाता है। ऐसे में उन्हें नमक डालकर दफन कर दिया जाता है।
सांभर झील तीन जिलों में बंटी है
सांभर झील प्रदेश के तीन जिलों में फैली हुई है। यह जयपुर, अजमेर और नागौर जिले में पड़ती है। सांभर झील नमक उत्पादन के अलावा पर्यटन और फिल्म शूटिंग के लिए एक पसंदीदा जगह बन गई है।
सांभर झील को लेकर यह है मान्यता
जयपुर से 100 किमी. दूर सांभर कस्बे में शाकंभरी माता का मंदिर है। इस मंदिर को करीब 2500 साल पुराना बताया जाता है। शाकंभरी माता चौहान वंश की कुलदेवी हैं। उन्हें मां दुर्गा का अवतार भी माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय में पृथ्वी पर सौ साल तक बारिश नहीं हुई। इससे अन्न-जल की कमी हो गई, तब मुनियों ने देवी भगवती की उपासना की। इस उपासना से खुश होकर मां दुर्गा ने शाकंभरी रूप में अवतार लिया। उनकी कृपा से वर्षा हुई और अन्न-जल का संकट खत्म हुआ। कुछ समय बाद मां की कृपा से उत्पन्न हुई प्राकृतिक संपदा को लेकर झगड़े शुरू हो गए। इससे नाराज हुई मां शाकंभरी ने यहां की संपदा और खजाने को नमक में बदल दिया। इस तरह से सांभर झील की उत्पत्ति होना माना जाता है।
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