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राजस्थान के पाली जिले के गांव कुड़की में कृष्ण भक्त मीराबाई का जन्म हुआ था। आज भी उनसे जुड़ी हुई कई निशानियां मौजूद है। पाली से करीब 130 किलोमीटर दूर कुड़की गांव में ‘मीरा कुड़की फोर्ट’ मौजूद है। कृष्ण भक्ति से समर्पित हिंदी साहित्य की महान कवयित्री मीराबाई का जन्म 1556 में अक्षय तृतीया को कुड़की गांव निवासी रत्नसिंह के घर हुआ था। मीरा बाई बचपन से ही कृष्ण भक्ति में लीन रही। करीब 9 साल तक कुड़की में रहने के बाद वो भगवान कृष्ण की मूर्ति को लेकर मेड़ता चली गई।
मां से पूछा मेरा दूल्हा कहां है
मीरा बाई के वंशज ठाकुर पुष्पेंद्र सिंह ने बताया कि गांव में आई एक बारात को देखकर मीरा ने अपनी माता से पूछा था कि मेरा दूल्हा कहां है, उनकी माता ने भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति की तरफ इशारा करते हुए कहा कि यह तेरा दूल्हा है, उसी दिन से मीरा कृष्ण की दीवानी हो गई।
महाराणा सांगा के पुत्र के साथ हुआ था मीरा का विवाह
ठाकुर पुष्पेंद्र सिंह राठौड ने बताया कि मीरा का विवाह महाराणा सांगा के बेटे उदयपुर के भोजराज के साथ हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही पति की मौत के बाद मीरा बाई कृष्ण भक्ति में लीन हो गई। ज्यादातर समय उनका साधु-संतों के साथ हरिकीर्तन में बीतता। उन्होंने बताया कि साधु-संतों से उनकी संगति भोजराज के परिजनों को अच्छी नहीं लगती थी। कई बार उन्हें मारने का प्रयास किया गया, लेकिन श्रीकृष्ण की भक्ती में लीन मीरा को कोई नहीं मार सका।
मेवाड़ छोड़ चली गईं थीं द्वारका
ठाकुर पुष्पेंद्र सिंह राठौड ने बताया कि रोज-रोज ससुरालवालों के व्यवहार से परेशान होकर मीरा बाई ने मेवाड़ छोड़ दिया और वृंदावन चली गईं। यहां से द्वारका गईं और मंदिर की सीढ़ियों पर मीरा बाई का प्राणांत हो गया। कृष्ण भक्ति की वजह से उन्हें खूब सम्मान भी मिला। यहां तकी हिंदी काव्य में मीरा बाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं।
कुड़की आज भी मीरा भक्ति का है साक्षी
जैतारण उपखंड का यह छोटा सा गांव आज भी कृष्ण मंदिर मीरा की भक्ति का साक्षी है। मीरा बाई द्वारा स्थापित इस मंदिर में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति की थी। आज भी उनके वंशज भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते है।
कुड़की में मीरा बाई की कई निशानियां है मौजूद
ठाकुर पुष्पेंद्र सिंह राठौड ने बताया कि कुड़की के महल में मीरा बाई का जन्म हुआ। देखभाल न होने की वजह से यह जर्जर हो चुका है। इसी के ठीक सामने मीरा द्वारा बनवाया श्रीकृष्ण भगवान का मंदिर है। मीराबाई की आखरी निशानियों के तौर उनके कमंडल, खड़ाऊ, रुद्राक्ष की मालाएं, शंख आदि धरोहर मौजूद है।
चमत्कारिक है यह स्थान
महल के आसपास बड़ी संख्या में तुलसी के पौधे हैं। बताया जाता है कि अपने आप यहां तुलसी के पौधे होते हैं। साथ ही पौधे पूरे साल हरे-भरे रहते हैं। हर साल यहां श्रीकृष्ण जन्माष्ट्रमी बड़े ही धूमधाम के साथ मनाई जाती है।
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