Sawan 2022: राजस्थान में है देश का एकमात्र शिव मंदिर, जहां होती है महादेव के अंगूठे की पूजा

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अभी तक आपने मंदिरों में शिवलिंग और शिव प्रतिमा के दर्शन किए होंगे लेकिन आज हम आपको महादेव के उस मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां शिव के पैर के अंगूठे की पूजा की जाती है। 

 

चार टन के नंदी की प्रतिमा स्थापित

सिरोही के हिल स्टेशन माउंट आबू से करीब 11 किलोमीटर दूर अचलगढ़ की पहाड़ियों पर अचलेश्वर महादेव मंदिर है। इस मंदिर में प्रवेश करते ही पंच धातु की बनी नंदी की प्रतिमा है। जिसका वजन चार टन है।

गर्भगृह में शिव के अंगूठे का निशान

वहीं मंदिर के अंदर गर्भगृह में शिवलिंग पाताल खंड के रूप में दिखाई देता है। जिसके ऊपर एक तरफ पैर के अंगूठे का निशान उभरा है। यह शिव का दाहिना अंगूठा माना जाता है। कहा जाता है कि इसी अंगूठे ने माउंटआबू के पहाड़ को थाम रखा है। जिस दिन निशान गायब हो जाएगा, उस दिन माउंटआबू के पहाड़ खत्म हो जाएंगे।

पौराणिक कथा

मंदिर को लेकर पौराणिक कथा है कि आबू पर्वत के नीचे ब्रह्मा खाई थी। इसी के पास वशिष्ठ मुनि रहते थे। उनकी कामधेनु गाय एक बार ब्रह्म खाई में गिर गई। तब उसे बचाने के लिए मुनि ने सरस्वती और गंगा का आह्वान किया। जिसके बाद ब्रह्म खाई पानी से जमीन की सतह तक भर गई। ऐसे में कामधेनु गाय बाहर आ गई। हादसे को टालने के लिए वशिष्ठ मुनि ने हिमालय जाकर ब्रह्म खाई को पाटने का अनुरोध किया। तब हिमालय ने अपने पुत्र नंदी वद्रधन को खाई पाटने का काम सौंपा। 

कहते हैं कि अर्बुन नाग नंदी वद्रधन को उड़ाकर ब्रह्म खाई के पास वशिष्ठ आश्रम लाया था। आश्रम में नंदी वद्रधन ने वरदान मांगा कि उसके ऊपर सप्त ऋषियों का आश्रम होना चाहिए। वहीं पहाड़ सबसे सुंदर और वनस्पतियों वाला होना चाहिए। वशिष्ठ ने वरदान दिया। इसी प्रकार अर्बुद नाग ने वर मांगा कि पर्वत का नामकरण उसके नाम से हो। वरदान मिलते ही नंदी वद्रधन खाई में उतरा तो वो धंसता ही गया। केवल नंदी वद्रधन की नाक और ऊपर का हिस्सा जमीन से ऊपर रहा, जो अब आबू पर्वत है।

This News is Updated by Khabre Fatafat
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