राजस्थान के इतिहास की बात करें तो 1914 में विदेशी दंपति विल फ्रायड सवाई माधो सिंह द्वितीय के यहां महमान बनकर आए। इस दौरान उन्होंने चीतों को देखने को देखने की इच्छा जाहिर की। माधो सिंह ने उन्हें बताया कि अब हमारे यहां चीते नहीं हैं। जयपुर से जाते समय विल फ्रायड ने कहा कि महाराज से वादा कि वह उनके लिए इंग्लैंड से चीतें भेजेंगे।
जयपुर फाउंडेशन के सियाशरण लश्करी के अनुसार इंग्लैंड में विल फ्रायड की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने अप्रैल 1921 में चीते के दो शावक जयपुर भेजे। कावस जदीन फर्म के जरिए चीतों के शावकों को जयपुर भेजा गया था। समुद्री जहाज से शावक मुंबई पहुंचे और फिर उन्हें रेल से जयपुर लाया गया। पांच साल बाद एक चीते की मौत हो गई थी। दूसरे चीते को रामनिवास बाग के जंतुघर में रखा गया। जहां 26 अगस्त 1931 से चीते पालने वाले नन्हे खान को उनकी देखभाल के लिए दस रुपए महीने दिए जाते थे।
जयपुर में इस मोहल्ले का नाम पड़ गया चीतावालान मोहल्ला
जयपुर के रामगंज इलाके के चीतावालान मोहल्ले में कई परिवारों को चीता पालने के लिए लाइसेंस दिए जाते थे। यहां रहने वाले अजीमुद्दीन के पास 1928 में चीता पालने का लाइसेंस था। राजा इन्हें अपने साथ शिकार पर ले जाते थे। साथ ही मुगलों और अंग्रेजों के लिए भी यहां के लोग शिकार किया करते थे।
नामीबिया से आठ चीते भारत लाए गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कूनो नेशनल पार्क में बॉक्स खोलकर तीन चीतों को छोड़ा था। आठ चीतों में से पांच मादा और तीन नर है। इनकी उम्र चार से छह साल है। इन चीतों को इंटरनेशनल नॉट-फॉर-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन चीता कंजर्वेशन फंड ने उपलब्ध कराया है। यह संस्था चीतों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। इसका हेडक्वार्टर नामीबिया है। प्रोटोकॉल के तहत इन चीतों को 30 दिनों के लिए अलग-अलग क्वॉरेंटाइन पिंजरों में रखा गया है।
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